स्तुति और कृतज्ञता (#8696)

परमोच्च ईश्वर के नाम से! तू महिमावंत और प्रशंसित, सर्वशक्तिमंत है। तू वह है जिसके ज्ञान के समक्ष ज्ञानीजन भी नगण्य दिखते हैं, पराजित हो जाते हैं, जिसके ज्ञान के समक्ष विद्वान भी अपनी अज्ञानता स्वीकारते हैं, जिसकी सामर्थ्‍य के समक्ष धनवान भी अपनी निर्धनता की साक्षी देते हैं, जिसके प्रकाश के समक्ष प्रज्ञावान भी अंधकार में खो जाते हैं, जिसके ज्ञान के मंदिर की ओर समस्त ज्ञान और समस्त बोध का सार उन्मुख होता है और जिसकी उपस्थिति के अभयस्थल के चतुर्दिक समस्त मानवजाति की आत्माएँ परिक्रमा करती हैं। 
तब मैं भला कैसे तेरे उस सारतत्व का उल्लेख और महिमा गान कर सकता हूँ जिसको समझने में विद्वान और ज्ञानीजन भी असफल रहे हैं, क्योंकि बिना समझे कोई भी मनुष्य उसकी महिमा गान नहीं कर सकता, न ही वह उसका वर्णन कर सकता है जहाँ तक वह पहुँच नहीं पाया है, जबकि तू तो शाश्वतकाल से अगम्य और अगोचर रहा है। भले ही मैं तेरी महिमा के आकाश और तेरे ज्ञान के साम्राज्य की ऊँचाई तक उड़ान भरने में अशक्त हूँ, लेकिन मैं तेरी उन कृतियों का वर्णन कर सकता हूँ, जो तेरे शिल्प की कथा कहते हैं। तेरी महिमा की सौगंध! हे समस्त हृदयों के परम प्रियतम्! मात्र तू ही मेरे आकुल प्राणों की वेदना शांत कर सकता है। यदि आकाश और धरती के सभी निवासी मिलकर भी तेरे चिन्हों के उस सूक्ष्मतम् अंश की महिमा का गान करने का प्रयास करें जिसके द्वारा तूने स्वयं को प्रकट किया है, तब भी वे असफल रहेंगे, फिर तेरे पावन शब्दों का कितना अधिक गुणगान होगा जो तेरे समस्त चिन्हों के जनक हैं।
समस्त स्तुति और महिमा तेरी हो ! तू, जिसकी सभी वस्तुओं ने साक्षी दी है कि तू ही है एक सत्य और तेरे अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं है, तू सदासर्वदा से सभी तुलनाओं और उपमाओं से परे है। सभी सम्राट तेरे सेवक हैं और सभी गोचर और अगोचर वस्तुएँ तेरे समक्ष अकिंचन मात्र हैं। तेरे अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं है, कृपालु, शक्तिशाली, परमोच्च !

-Bahá'u'lláh
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स्तुति और कृतज्ञता (#8695)

सर्वस्तुति हो तेरी, हे मेरे ईश्वर! तू, जो समस्त महिमा और भव्यता, महानता और गौरव, सम्प्रभुता और साम्राज्य, उच्चता और कृपालुता, विस्मय और शक्ति का स्रोत है। जिसे तू चाहता है उसे अपने परम महान सिंधु को स्वीकारने का सौभाग्य प्रदान करता है। और जिसे तू चाहता है उसे अपने परम महान नाम को स्वीकारने का सौभाग्य प्रदान करता है। आकाश और धरती के समस्त वासियों में से कोई भी तेरे तेरी सम्प्रभु इच्छा को पूरा होने से रोक नहीं सकता। अनादिकाल से तूने सम्पूर्ण सृष्टि पर शासन किया है और करता रहेगा तेरा ही अधिपत्य सदा समस्त सृजित वस्तुओं पर है। सर्वसामर्थ्‍यवान, परम उदात्त सर्वशक्तिशाली सर्वप्रज्ञ के अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं है।
हे स्वामी! अपने सेवकों के मुखड़ों को दीप्त कर दे और उनके हृदय को निर्मल कर दे कि वे तेरे दिव्य अनुग्रहों की ओर उन्मुख हो सकें और पहचान सकें उसे जो तेरा और तेरे दिव्य सारतत्व का उद्गमस्थल है। वस्तुतः, तू ही समस्त लोकों का स्वामी है! तेरे अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं, अबाधित, सर्ववशकारी।

-Bahá'u'lláh
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स्तुति और कृतज्ञता (#8694)

स्तुति हो तेरे नाम की, हे स्वामी, मेरे ईश्वर! तू वह है जिसकी सभी वस्तुएँ आराधना करती हैं, जो किसी की भी आराधना नहीं करता, जो सबका स्वामी है, जो किसी के अधीन नहीं है, जो सबका ज्ञाता है और जो किसी को भी ज्ञात नहीं है। तूने मनुष्यों के मध्य अपनी पहचान करानी चाही थी इसलिये अपने मुख से निकले एक शब्द से तूने सृष्टि को अस्तित्व दिया था, ब्रह्माण्ड को स्वरूप दिया था। तेरे अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं है, स्वरूपदाता, स्रष्टा, सामर्थ्‍यवान्, सर्वशक्तिवान्। तेरी इच्छा के क्षितिज पर प्रकाशमान इस एक शब्द के माध्यम से मैं तुझसे याचना करता हूँ कि मुझे उस जीवन-जल को ग्रहण करने के योग्य बना जिसके द्वारा तूने अपने प्रियजनों के हृदयों को अनुप्रणित और आत्माओं को चैतन्य किया है; ताकि मैं हर समय प्रत्येक परिस्थिति में पूर्णतया तेरी ही ओर उन्मुख रहूँ। तू शक्ति, महिमा और कृपा का ईश्वर है। तेरे अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं है, तू सर्वोच्च शासक, महिमावंत, सर्वदर्शी है।

-Bahá'u'lláh
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स्तुति और कृतज्ञता (#8693)

महिमावंत है तू, हे स्वामी, मेरे ईश्वर! मैं तेरा आभार प्रकट करता हूँ कि तूने मुझे अपने प्रकटरूप को पहचानने और अपने शत्रुओं से विरत होने योग्य बनाया है; और तेरे दिनों में उनके, द्वारा किये गये दुष्कर्मों को मेरे सम्मुख खोलकर रख दिया है और उनके प्रति मुझे आसक्तियों से मुक्त किया है और पूर्णतया तेरी दया और कृपामय अनुग्रहों की ओर उन्मुख होने में समर्थ बनाया है। मैं इसके लिये भी तेरा आभार प्रकट करता हूँ कि तूने अपनी इच्छा के मेघों द्वारा मुझ तक वह भेजा है जिसने मुझे अधर्मियों के संकेतों और अविश्वासियों के भ्रांत विचारों से इतना मुक्त कर दिया है कि मैंने अपना हृदय दृढ़ता से तुझमें लगा लिया है और ऐसे लोगों से दूर भाग आया हूँ जिन्होंने तेरे मुखारबिन्द के प्रकाश को नकार दिया है। तब मैं पुनः तेरा आभार प्रकट करता हूँ  कि तूने मुझे अपने प्रेम में दृढ़ रहने का, तेरी स्तुति करने का, तेरा गुणगान करने का और तेरे उस कृपा-पात्र से पान करने का अवसर दिया है जो सभी दृश्य और अदृश्य वस्तुओं के परे है। तू सर्वशक्तिशाली, परम उदात्त, सर्वमहिमाशाली, सभी को प्रेम करने वाला है।

-Bahá'u'lláh
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